महान प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट मिहिर भोज ने की भारत की सीमाओं की रक्षा: मोमराज गुर्जर
महान प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट मिहिर भोज ने की भारत की सीमाओं की रक्षा: मोमराज गुर्जर
धूमधाम से मनाया गया मिहिरोत्सव,
अमरोहा, 1 सितंबर , महान प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट गुर्जर प्रतिहार वंश से संबंध रखने वाले मिहिर भोज की जयंती पर गुर्जर समाज द्वारा भव्य एवं धूमधाम ढंग से मिहिरोत्सव 2019 कार्यक्रम आयोजित किया गया, इस अवसर पर भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष डॉक्टर मोमराज गुर्जर ने सम्राट मिहिर भोज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय एकता और अखंडता का शंखनाद किया
प्राप्त विवरण के अनुसार सहकारी कताई मिल स्थित ब्रिलियंट स्कॉलर्स पब्लिक स्कूल के सभागार में आयोजित सम्राट मिहिर भोज जयंती कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पूर्व भाजपा जिला अध्यक्ष तथा कृषि अनुसंधान परिषद भारत सरकार की प्रबंध समिति के सदस्य डॉ मामराज गुर्जर ने कहा किमिहिरभोज प्रतिहार, गुर्जर प्रतिहार राजवंश के सबसे महान राजा माने जाते हैं। इन्होने लगभग ५० वर्ष तक राज्य किया था। इनका साम्राज्य अत्यन्त विशाल था और इसके अन्तर्गत वे क्षेत्र आते थे जो आधुनिक भारत के राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियांणा, उडीशा, गुजरात, हिमाचल आदि राज्यों हैं।
उन्होंने कहा किमिहिरभोज गुर्जर प्रतिहार विष्णु भगवान के भक्त थे तथा कुछ सिक्कों मे इन्हे 'आदिवराह' भी माना गया है। मेहरोली नामक जगह इनके नाम पर रखी गयी थी।
हिंदी सलाहकार समिति श्रम मंत्रालय भारत सरकार के सदस्य डॉ यतींद्र कटारिया विद्यालंकार ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया। मिहिरभोज प्रतिहार के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फेला हुआ था। ये धर्म रक्षक सम्राट शिव के परम भक्त थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। 50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण के दौरान लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है, साथ ही मिहिरभोज प्रतिहार की महान सेना की तारीफ भी की है, साथ ही मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती हुई बतायी है।
उन्होंने कहा कि 915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिरभोज प्रतिहार की 36 लाख सेनिको की पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतनी भय थी कि वे वराह यानि सूअर से नफरत करते थे। मिहिरभोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगो ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी।
श्री कटारिया ने कहा कि गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज के मित्र काबुल का ललिया शाही राजा कश्मीर का उत्पल वंशी राजा अवन्ति वर्मन तथा नैपाल का राजा राघवदेव और आसाम के राजा थे। सम्राट मिहिरभोज के उस समय शत्रु, पालवंशी राजा देवपाल, दक्षिण का राष्ट्र कटू महाराज आमोधवर्ष और अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र नारायणलाल को युद्ध में परास्त करके उत्तरी बंगाल को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। दक्षिण के राष्ट्र कूट राजा अमोधवर्ष को पराजित करके उनके क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिये थे। सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पूरी तरह पराजित करके समस्त सिन्ध गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने क्षत्रिय प्रतिहार सम्राट के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने के लिए अनमहफूज नामक गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे।
उन्होंने कहा कि सम्राट मिहिरभोज नही चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रहें और आगे संकट का कारण बने इसलिए उसने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह को जीत कर गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पंहुचा दी और इसी प्रकार भारत देश को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची व आसाम तक, हिमालय से नर्मदा नदी व आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ तथा सुरक्षित थी।
इस अवसर पर हरलाल शास्त्री प्रधान नरेंद्र कटारिया महाशय जयचंद सुखपाल गुर्जर नरेंद्र उर्फ नीटू अशोक गुर्जर नैवीर सिंह बटार महिपाल सिंह संजय भाटी आदि मौजूद रहे कार्यक्रम प्रारंभ होने से पूर्व रागिनी के माध्यम से सम्राट मिहिर भोज को याद किया गया तथा उनके चित्र पर फूल चढ़ाकर भव्य स्मरण किया गया
धूमधाम से मनाया गया मिहिरोत्सव,
अमरोहा, 1 सितंबर , महान प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट गुर्जर प्रतिहार वंश से संबंध रखने वाले मिहिर भोज की जयंती पर गुर्जर समाज द्वारा भव्य एवं धूमधाम ढंग से मिहिरोत्सव 2019 कार्यक्रम आयोजित किया गया, इस अवसर पर भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष डॉक्टर मोमराज गुर्जर ने सम्राट मिहिर भोज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय एकता और अखंडता का शंखनाद किया
प्राप्त विवरण के अनुसार सहकारी कताई मिल स्थित ब्रिलियंट स्कॉलर्स पब्लिक स्कूल के सभागार में आयोजित सम्राट मिहिर भोज जयंती कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पूर्व भाजपा जिला अध्यक्ष तथा कृषि अनुसंधान परिषद भारत सरकार की प्रबंध समिति के सदस्य डॉ मामराज गुर्जर ने कहा किमिहिरभोज प्रतिहार, गुर्जर प्रतिहार राजवंश के सबसे महान राजा माने जाते हैं। इन्होने लगभग ५० वर्ष तक राज्य किया था। इनका साम्राज्य अत्यन्त विशाल था और इसके अन्तर्गत वे क्षेत्र आते थे जो आधुनिक भारत के राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियांणा, उडीशा, गुजरात, हिमाचल आदि राज्यों हैं।
उन्होंने कहा किमिहिरभोज गुर्जर प्रतिहार विष्णु भगवान के भक्त थे तथा कुछ सिक्कों मे इन्हे 'आदिवराह' भी माना गया है। मेहरोली नामक जगह इनके नाम पर रखी गयी थी।
हिंदी सलाहकार समिति श्रम मंत्रालय भारत सरकार के सदस्य डॉ यतींद्र कटारिया विद्यालंकार ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया। मिहिरभोज प्रतिहार के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फेला हुआ था। ये धर्म रक्षक सम्राट शिव के परम भक्त थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। 50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण के दौरान लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है, साथ ही मिहिरभोज प्रतिहार की महान सेना की तारीफ भी की है, साथ ही मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती हुई बतायी है।
उन्होंने कहा कि 915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिरभोज प्रतिहार की 36 लाख सेनिको की पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतनी भय थी कि वे वराह यानि सूअर से नफरत करते थे। मिहिरभोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगो ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी।
श्री कटारिया ने कहा कि गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज के मित्र काबुल का ललिया शाही राजा कश्मीर का उत्पल वंशी राजा अवन्ति वर्मन तथा नैपाल का राजा राघवदेव और आसाम के राजा थे। सम्राट मिहिरभोज के उस समय शत्रु, पालवंशी राजा देवपाल, दक्षिण का राष्ट्र कटू महाराज आमोधवर्ष और अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र नारायणलाल को युद्ध में परास्त करके उत्तरी बंगाल को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। दक्षिण के राष्ट्र कूट राजा अमोधवर्ष को पराजित करके उनके क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिये थे। सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पूरी तरह पराजित करके समस्त सिन्ध गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने क्षत्रिय प्रतिहार सम्राट के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने के लिए अनमहफूज नामक गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे।
उन्होंने कहा कि सम्राट मिहिरभोज नही चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रहें और आगे संकट का कारण बने इसलिए उसने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह को जीत कर गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पंहुचा दी और इसी प्रकार भारत देश को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची व आसाम तक, हिमालय से नर्मदा नदी व आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ तथा सुरक्षित थी।
इस अवसर पर हरलाल शास्त्री प्रधान नरेंद्र कटारिया महाशय जयचंद सुखपाल गुर्जर नरेंद्र उर्फ नीटू अशोक गुर्जर नैवीर सिंह बटार महिपाल सिंह संजय भाटी आदि मौजूद रहे कार्यक्रम प्रारंभ होने से पूर्व रागिनी के माध्यम से सम्राट मिहिर भोज को याद किया गया तथा उनके चित्र पर फूल चढ़ाकर भव्य स्मरण किया गया
महान प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट मिहिर भोज ने की भारत की सीमाओं की रक्षा: मोमराज गुर्जर
Reviewed by Hindustan News 18
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September 01, 2019
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